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हार के मलबों पर चढ़कर

Nitin Pal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मलाल यह नहीं कि हारा था जब मैं,
        
                                                    
                            
मलाल वह नहीं कि जीता था जब वह।
अवलोकन में सोचता कि कसर कसने में कहाँ रह गई,
बातों-बातों के उस रास्तों में, वह जीत की झंकार कहाँ खो गई!

मैं वह ना था जो सोचता अनोखा वहाँ,
इंतज़ार करता उस साजिशों के मंजरों में फँसना,
जो बाद अनूठेपन में उस करारी हार को झेलने का
प्रभाव कर दे मेरा ऐसा-तैसा!

पराजित होती जाती मेरी हिम्मत की कसाव,
रातों-रातों में खुल गई अंदर एक-एक पेचों की दुकान!
हर पल जीत की आस में तड़पता था जब मैं,
परिणाम देखकर हिलौले हर क्षण, हर पल और हर कल में मरता था जब मैं!

परिणाम देखा, गुस्सा आया,
मेहनत की आस का एक पेज खुला पाया!
कभी मेहनत ना करने की मनुषियत धीरे-धीरे जब छाई मुझ पे,
फिर एक आस की झंकार... मैंने उस माँ से पाई मुझमें!

फिर उठ खड़ा हुआ, उन हारों के मलबों पर चढ़कर,
फिर मिल गया एक नया आसमान—आगे बढ़कर और चढ़कर!
आग उठी है अब... तो इसे लहकने दो!
जीतों की जीत को पाने की आस... अब चहकने दो!
2 सप्ताह पहले
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