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अदालत न जाना, अदालत न जाना।

Niraj Kumar Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भले धूप में उम्र सारी बिताना,
        
                                                    
                            
भले फाके से तुम मवेशी चराना।
भले कर्ज के बोझ में ही दब जाना,
म मगर मेरे बच्चे, अदालत न जाना—
अदालत न जाना, अदालत न जाना,
अदालत न जाना, अदालत न जाना।
ये मंदिर नहीं, कोई सौदागरों की मण्डी है,
यहाँ न्याय की हर एक ईंट गंदी है।
न अपना यहाँ कोई, न कोई सगा है,
यहाँ हर कागज पर ठगी का ठप्पा लगा है।
वकीलों के चश्मे में नीयत बुरी है,
यहाँ तारीख पर तारीख ही हर खुशी है।
तजुर्बे से कहती ये बूढ़ी ज़मीं है,
यहाँ कागज़ के टुकड़ों में जान बची है।
दलालों के शिकंजे में घर बिक रहे हैं,
यहाँ चोर-उचक्के सरेआम टिक रहे हैं।
थानों की दहलीज़ पर सच रो रहा है,
यहाँ फैसले का सौदा सरेआम हो रहा है।
जहाँ सच की छाती पे खंजर चले हैं,
वहाँ झूठ के दीप हर रोज़ जले हैं।
गवाही की बोली यहाँ रोज़ लगती,
तबेले से बदतर यहाँ आँख ठगती।
जो एक बार इस दलदल में फँसा,
वो घर-घाट भूला, वो बस मूहँ से हँसा।
मुकदमों की चक्की में ऐसा पिसेगा,
कि जीते-जी इंसान अंदर से सड़ेगा।
ये फाइल की दुनिया है, फरेब का डेरा,
यहाँ साए से डरता है हर इक सवेरा।
ज़रा सी भूल पर घर-बार लुट जाएगा,
भरोसे का हर एक मीनार टूट जाएगा।
न पन्नों पे लिखना, न दस्तखत करना,
इस आग के दरिया से बचकर ही धरना।
जहाँ सीधे लोगों का दम घुट रहा है,
वहीं शातिरों का मुकद्दर संवर रहा है।
न आँखों से देखना, न मुड़कर ताकना,
खुद को इस अंधे कुएँ से बचाक रखना।
भले जिंदगी भर अकेले ही रहना,
मगर भूलकर भी न यह दर्द सहना।
अदालत न जाना, अदालत न जाना,
अदालत न जाना, अदालत न जाना।
1 सप्ताह पहले
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