विज्ञापन

मेरा पहला घर

mursaleen fatma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            न कोई छत, न कोई दीवार, न कोई कोना था,
        
                                                    
                            
रुई-सी नरम चादर-सा बस एक बिछौना था।
न महलों की चाहत थी, न दौलत का कोई मान,
मेरा पहला घर कोई मकान नहीं... मेरी माँ का गर्भस्थान।

वहीं पहली बार धड़कनों ने मुझे लोरी सुनाई,
वहीं पहली बार साँसों ने जीवन की लौ जगाई।
हर पल माँ ने अपनी साँसों से मुझे सींचा,
हर दर्द को मुस्कुराकर अपने हिस्से में खींचा।

मैंने जब भी करवट ली, वह हौले से मुस्काई,
मेरी हर छोटी-सी हलचल पर दुनिया भूल गई।
मेरे माथे को हज़ारों बार दुआओँ में चूमा,
मुझे अपनी बाँहों में समेटकर हर डर को चुप कराया।

उसने अपने रक्त से मेरी रगों में रंग भरे,
अपनी भूख मिटाकर मेरे जीवन के दीप धरे।
अपने ही अस्तित्व को टुकड़ों में बाँट दिया,
मुझे जन्म देने के लिए खुद को हर पल अर्पित किया।

न वह बंगला था, न कोई आलीशान फ्लैट,
न सोने-चाँदी का दरवाज़ा, न ऊँची कोई छत।
फिर भी दुनिया की सारी दौलत मिलकर भी,
वैसा घर किसी बाज़ार में कभी खरीद नहीं सकती।

उस घर पर बस एक नन्हे मेहमान का अधिकार होता है,
जहाँ प्रेम बिना शर्त, बिना किसी व्यापार होता है।
वह घर छोड़ तो देता है हर बच्चा एक दिन,
पर उसका दरवाज़ा माँ के दिल में उम्र भर खुला रहता है।

आज भी जब दुनिया मुझे ठुकरा देती है,
याद उसी पहले घर की गोद मुझे सुला देती है।
क्योंकि मेरा पहला घर ईंटों से नहीं बना था—
वह मेरी माँ थी...
और माँ से बढ़कर इस दुनिया में कोई घर कभी नहीं बना।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

श्री सनातन

671 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13377 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7459 कविताएं

View Profile