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समय की धारा

Mukesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समय की धारा बहती जाए, कौन यहाँ ठहरा है?
        
                                                    
                            
मुट्ठी भर यह जीवन अपना, क्यो शोक इतना गहरा है?
कल तक जो था राजमहल में, आज धूल में सोता है,
जिसने जग को जीत लिया था, वह भी जग जग कर रोता है।
न धन साथ, न मान साथ है, न कोई अभिमान चले,
अंतिम पथ पर मनुष्य अकेला, अपने ही कर्मों के साथ चले।
छाया जैसी देह हमारी, साँझ पड़े ढल जाती है,
सत्य वही जो अंत समय में, अंतर-ज्योति जगाती है।
3 सप्ताह पहले
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