एक जुगनू चमक उठा नागाह पीपल की शाखों से..
मुस्कुरा कर कह गया कुछ... स्याह काली रातों से!
तू अंधेरों की हुकूमत पर भले नाज़ां रहे..
मिट जाएगी ये तीरगी चाहे घनेरा अंधेरा रहे!
मैं उजालों की विरासत का बड़ा वारिस नहीं..
है मगर फ़ितरत ही मेरी..अंधेरों से बगावत की!
एक भरम पाल लिया.. अंधेरों ने ख़ुद से ख़ुद में..
कि,उलझ गया वो स्याह नागाह, एक जुगनू से जद्दोजहद में!
- मीना गोपाल त्रिपाठी