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हिन्दी हमारा अभिमान है

Meena Gopal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल की हिन्दी एक दरिया थी, जिसमें गहरा ठहराव था
        
                                                    
                            
अक्षरों में तहज़ीब छुपती थी, हर शब्द का एक भाव था

आज की हिन्दी विज्ञापनों की होर्डिंग पर टंगी एक दासी है ग्लोबल बाज़ार के शोर में,जो भीतर से उदास और प्यासी है

हिन्दी को विदेशी रंग में रंगकर, आधुनिक कहा जाता है
महानगरों में हिन्दी बोलने वाला, अनपढ़ समझा जाता है


कल पत्रों में हिंदी थी आज , आज वाट्सअप की भाषा है
कभी शब्दों में अपनापन था , आज संक्षिप्त सी परिभाषा है

कभी लिखते थे भाव मन के... पन्नों पर उकेरकर...
वहीं अब रह गईं भावनाएं ...इमोजी में सिमटकर...

आज भले ही अड़चनों से जूझती है हिंदी...
मगर, कल संस्कृति के उपवन का परिमल है हिंदी

दुनिया की हर ज़ुबाँ का.. सम्मान हम करेंगे
पर 'हिन्दी हैं हम वतन हैं' पर अभिमान हम करेंगे
- मीना गोपाल त्रिपाठी
6 दिन पहले
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