विज्ञापन

सोच कर थोड़े ही

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सोच कर थोड़े ही निकले ही थे घर से
        
                                                    
                            
मंजिलें इस क़दर फुसला देंगी
रोज़ कहते है लौट चलो क़दमों से
रुक जाते हैं वो शायद डरते हैं की हसरतें हिसाब लेंगी
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dr fouzia

6957 कविताएं

View Profile