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टिमटिमाती दिए जो भायी नहीं तो क्या ही जगमगायी ज़िन्दगी

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सिर्फ़ तस्वीरों में अगर अच्छी लगी तो क्या ही लगी ज़िंदगी
        
                                                    
                            
जो टुकड़ों में जीनी पड़ी तो टुकड़ा टुकड़ा ही जी ज़िंदगी
हर हँसी के पीछे अगर सोने की गिन्नी लगी तो क्या ही संजोई ज़िंदगी
हर सपने के लिए जो टटोले जेब तो क्या ही कमायी ज़िन्दगी
सुकून की हवा चैन की धूप आँगन कभी आई नहीं तो क्या घर ही बनायी ज़िंदगी
टिमटिमाती दिए जो भायी नहीं तो क्या ही जगमगायी ज़िन्दगी
एक महीने पहले
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