तेरे इश्क़ में बदनाम हुआ, फिर भी तेरा ही नाम हुआ,
दर्द की इस लंबी राहों में, बस तेरा ही पैग़ाम हुआ।।
लोगों ने पत्थर खूब उछाले, हँसकर हमने सह भी लिया,
इश्क़ अगर गुनाह था सच में, ये गुनाह भी आम हुआ।।
तेरी यादों की बारिश ने, दिल का हर ज़ख्म भिगो डाला,
सूखा-सूखा सा जो मौसम था, पल में वो गुलफ़ाम हुआ।।
जिसको अपना रब समझा था, उसने ही ठुकरा डाला,
फिर भी मेरे लब पर केवल, तेरा ही एहतराम हुआ।।
हमने वफ़ा के दीप जलाए, आँधी चाहे जितनी चली,
झूठ की महफ़िल हार गई,सच आख़िर सर-ए-आम हुआ।।
अब तो मेरी तन्हाई भी,मुझसे तेरी ही बातें करती है ,
हर आहट में तेरा चेहरा, हर धड़कन में मुकाम हुआ।।
'कवि एमके सिंह' ये दुनिया चाहे लाख मुझे इल्ज़ाम दे,
तेरे इश्क़ में बदनाम हुआ, मगर शायरी का नाम हुआ।।