मेरी रूह में तेरे एहसास का इक अंश रहा,
उम्र भर दिल पे उसी प्यार का अनुबन्ध रहा।।
वक़्त बहता गया, मौसम भी बदलते ही रहे,
दिल के आँगन में तेरा नाम सुवासित रहा।।
जिसको दुनिया ने मेरी हार का किस्सा समझा,
वो मेरी हिम्मत का सबसे बड़ा प्रबन्ध रहा।।
दर्द ने जब भी मेरे हौसले को तोड़ने चाहे,
मुस्कुराना ही मेरा आख़िरी प्रतिशोध रहा ।।
मैंने चाहत को कभी लाभ का सौदा न किया,
प्रेम तो हर दौर में मेरा एक मात्र धर्म रहा।।
जिस्म मिट्टी में मिला, नाम भी धुँधला होगा,
नेकी का एक नन्हा - सा अंश अमर रहा।।
'एम के सिंह' की क़लम झूठ के आगे न झुकी,
हर ग़ज़ल में सच का ही उजला अंश रहा।।