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अड़ी हो क्यूं ज़िद पर अभी भी

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी भी गुनहगार हूं मैं
        
                                                    
                            
आज तक ये नकारा नहीं है
तुम्हें तब भी स्वीकारा नहीं था
और अब भी स्वीकारा नहीं है।

चांद में चांदनी की लड़ी है
पर ज़माने की बदरी घनी है
रौशनी में नहाने की ख्वाहिश
लोगों को गंवारा नहीं है।

देख पहली नजर मुस्कराना
प्यार की वो कोई बात ना थी
ऐसी दौलत में क्या हक जमाना
जो कभी भी हमारा नहीं है।

अड़ी हो क्यूं ज़िद पर अभी भी
रोक लो और मना लो दिल को
सौंप दूं कैसे तुमको कि ये दिल
जो अब भी तुम्हारा नहीं है।

एकतरफा मोहब्बत तुम्हारा
जिंदगी में जहर घोल देगी
इसलिए बात मानो हमारी
दिल ने तुमको पुकारा नहीं है।।
एक महीने पहले
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