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कैसे कहूँ कि अब बिक चुका हूँ मैं

Manoj B

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कैसे कहूँ कि अब बिक चुका हूँ मैं,
        
                                                    
                            
वो अक्स अब नहीं रहा, जो पहले कभी था मैं।
मेरी हर साँस पर अब शर्तों का पहरा है,
इस दिखावे की हँसी के पीछे, ज़ख्म बहुत गहरा है।
तुम कहाँ समझ पाओगी मेरी असली मोहब्बत को,
बड़ी मुश्किलें होती हैं, तेरा भक्त बनने में।
अपना वजूद मिटा कर, सिर्फ तुझे पूजने की खातिर,
हर रोज़ खुद से लड़ना पड़ता है, इस सर्द ज़माने में।
एक पूरा ज़माना गुज़ारा है मैंने तेरे इंतज़ार में,
यूँ ही नहीं कोई खोता, इस कदर अपने खुदा में।
तेरी तलाश में निकला था, तेरा ही होकर रह गया,
मैं खुद को ढूँढने चला था, और खुद ही में खो गया।
- मनोज भटकर (फ़कीर)
2 महीने पहले
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