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मतपेटी का आईना

LOKESH KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मतपेटी में बंद आवाज़ का अरमान रह गया है,
        
                                                    
                            
स्याही लगी उँगली पर बस एक निशान रह गया है।

जिस चौखट पर जनता ने अपना भरोसा रखा था,
उसी चौखट पर सवालों का तूफ़ान रह गया है।

जिसे कहते थे हम जनमत की सबसे बड़ी ताक़त,
उसी जनमत का जाने कैसा मान रह गया है।

कभी चुनाव आईना था इस मुल्क के चेहरे का,
अब आईने में धुँधला-सा हिंदुस्तान रह गया है।

सवालों की स्याही सूख गई काग़ज़ के ऊपर,
जवाबों की जगह बस एक बयान रह गया है।

जिस उँगली ने लिखनी थी हुकूमत की नई राहें,
उस उँगली में अब बस स्याही का निशान रह गया है।

किताबों में संविधान आज भी रोशन है मगर,
उसके बाहर हर पन्ना जैसे इम्तिहान रह गया है।

जनता की आवाज़ को कहते रहे लोकतंत्र की धड़कन,
मगर धड़कनों के बीच कैसा सन्नाटा-सा गुमान रह गया है।

ये कैसा दौर है, किस मोड़ पर आ पहुँचा जहाँ,
सवाल ज़िंदा हैं, मगर जवाब बेजान रह गया है।

मैं ऐसे मुल्क में रहता हूँ—यही सबसे बड़ा अफ़सोस,
जहाँ लोकतंत्र तो है, पर उसका एहसास कहाँ रह गया है।
2 सप्ताह पहले
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