विज्ञापन

पंचतत्व और अंतिम सत्य

Lavkush Awasthi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ॥ पंचतत्व और अंतिम सत्य ॥
        
                                                    
                            
डोलती साँसों की डोरी, छूटता संसार था,
द्वार पर आकर खड़ा वो अंतिम पहरेदार था।
ना कोई आवाज़ गूँजी, ना कोई आहट हुई,
देह से छूटी ये माटी, रूह अब रुख़सत हुई।
माँ खड़ी व्याकुल बिलखती, चीखती थी बार-बार,
बाप की आँखें पुकारें, देख खुद को यूँ लाचार।
भाई की वो काँपती धुन, बहन की वो सिसकियाँ,
एक पल में ढह गया सब, छूटती नज़दीकियाँ।
मुझको छूकर चीखते सब, नाम मेरा ले रहे,
रोकने को प्राण मेरे, लाख मिन्नत कर रहे।
‘चल समय पूरा हुआ अब’, काल ने मुझसे कहा,
जो समेटा उम्र भर था, कुछ न अब तेरा रहा।
चार कांधों पर सजी फिर काठ की अंतिम सवारी,
छोड़ अपनी हवेली, हो गई चलने की तैयारी।
अग्नि की लपटों ने छूकर भस्म सब कुछ कर दिया,
पंचतत्वों ने समेटा, नाम बाकी कर दिया।
यह न था कोई सपन जो आँख खुलते खो गया,
'स्वास्तिक' का सत्य पूरा, अंत जीवन हो गया।
- लवकुश अवस्थी
6 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Shivam Kumar

1 कविता

View Profile