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उलझन जिंदगी की

Lalit Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमारी ही कमी है,
        
                                                    
                            
तुम्हें क्या बताएं,
खुद के ही पास कुछ नहीं,
तुम्हें क्या दिलाएं,
साँसें भी आती जाती है,
इससे क्या दिल लगाएं,
मौत ने हम खरीद रखा है,
तुम्हें क्या बचाएं
ये घर तो अधूरा है,
तुम्हें क्या बसाए,
कौन किसका रिश्तेदार हैं,
कौन पराया कौन अपना,
अब खुद को क्या समझाएं,
अब जहाँ जिंदगी शुरू हुई,
उसे क्यों उलझाए।

- ललित दाधीच
एक महीने पहले
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