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भटकता मुसाफिर

kshama Pal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भटकता मुसाफिर
        
                                                    
                            

एक दर-दर भटकता मुसाफिर हूं मैं
मुझे न पता मेरी मंजिल कहां है
मेरा हाल कोई पूछे तो मैं बताऊं
इस दुनिया से बेखबर बेगाना हुं मैं

हर राह में मुझको ठोकर मिली है
ज़ख्मों पर मरहम लगाने वाला नहीं है
कोई मेरा होता तो मैं बुलाता
अब अपने ज़ख्मों का मरहम हुं मैं

हर जगह ढुंढता हुं उस बेजुबा को
सारे ग़म बता दूं उस मेहरबां को
ऐसी राह छोड़ा है मैंने की क्या खता है
ओ बरखुरदार तेरे दरस का फकीरा हुं मैं

शहर बसा है बने घर और महल हैं
जिधर देखता हूं उधर ही चहल है
जिसमें मैं बैठ जाऊं वो छत है न घर है
उम्र दराज है कुछ दिन का किरायेदार हुं मैं
4 दिन पहले
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