हर ख़्वाब हर ज़ज़्बात सदके करती मैं उसकी खुदाई में
मुहब्बत करती ग़र दुपट्टा बड़ा होता पगड़ी सें लम्बाई में
तू बेला-इत्तला ज़ब ज़ाहिर होता हैं आँखे ठहर जाती हैं
डूबकर भी डूब नहीं सकती मैं तेरी आँखों की गहराई में
इश्क़ तों था पऱ लबों पऱ ताले झड़ दिए हमनें मजबूरन
कैसे कहूँ, बड़ा तड़पुंगी राम कसम इस दर्द-ए-जुदाई में
तू बस मुहब्बत कर शिकवा न कर महबूब सें कुछ भी
ऊपरवाला सबका नसीब लेकर बैठा हैं अपनी कलाई में
चाहे बेवफ़ा नाम दे चाहे तों सौ इल्ज़ाम दे सब कुबूल हैं
चाहकर भी "कृष्णा" मर नहीं सकती इश्क़-ए-तन्हाई में
-कृष्णा शर्मा