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दौर-ए-अज़ीयत में अपनों की चाहत का क्या कीजे

Krishna Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दौर-ए-अज़ीयत में अपनों की चाहत का क्या कीजे
        
                                                    
                            
दिल ही मर गया तों फिर तौक-ए-मुहब्बत का कीजे

एक मुद्द्त हुई तेरे दर पऱ बैठे हुए इबादत में हमकों
मन्नत का धागा ही टूट गया तों शिद्दत का क्या कीजे

क्या डरायेगा ये ज़माना हमको कयामत के ख़ौफ़ सें
पाया हैं दाग़-ए-मुहब्बत क़ो तों राहत का क्या कीजे

ख्वाहिश हैं इस क़दर गले सें लगो मेरा निशां न रहे
मौत की कगार पऱ खड़े अब इस शराफत का कीजे

इस ज़िस्म की रिहाई मुमकिन तों हैं पऱ मग़र कृष्णा
पिंजरें में रूह फंस चुकी तों जमानत का क्या कीजे
-कृष्णा शर्मा
2 महीने पहले
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