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कहानी एक माँ की

Kiran Rana

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन ही था, जब सिर से
        
                                                    
                            
माँ-बाप का साया उठ गया,
नन्हीं-सी उम्र में ही
जीवन का हर रंग रूठ गया।
छब्बीस बरस की उम्र में
नई डगर पर कदम बढ़ाए,
एक ऐसे घर की चौखट चूमी
जहाँ तीन मासूम पहले से थे आए।
न कोख से जन्मे थे वो,
पर ममता ने फ़र्क कहाँ जाना,
गोद में खिलाया, रातों को सुलाया,
हर आँसू को अपना माना।
पति, बच्चे, घर और खेती,
हर ज़िम्मेदारी हँसकर उठाई,
अपने हिस्से के सारे सुख
किस्मत ने जैसे कभी न लिखवाए।
न शिकायत की, न हार मानी,
हर दर्द को चुपचाप सहती रही,
सबके जीवन में दीप जलाती,
खुद अँधेरों में रहती रही।
आज वही बच्चे अपने-अपने
घर-आँगन बसाकर चल दिए,
जिन्हें सीने से लगाकर पाला,
वो भी समय के साथ निकल गए।
अब माँ की आँखों में बस
एक ही सवाल ठहर जाता है—
"क्या मेरी किस्मत इतनी रूठी थी,
कि मुझे कभी सुख नसीब ही नहीं हुआ?"
2 महीने पहले
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