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तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं ओस बूँद सी ढलक गई तुम भोर किरण का चुंबन हो
        
                                                    
                            
मैं अर्थ हीन सी एक व्यथा तुम प्राणों का शुभ स्पंदन हो
यह देह वस्त्र तो नश्वर है मैं रूह का नेह निभाऊँगी
तुम कोरे कागज़ से आना मैं गीत नया बन छाऊँगी
इस शोर भरी सी दुनिया में तुम मेरा एक मुकाम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये

मैंने आँसू के रेशम से बस तेरी मूरत गूँथी है
ये रस्म रिवाज़ों की दुनिया मेरे लिए तो झूठी है
जब रूप रंग के मेलों से यह पागल मन उब जाएगा
तब बिना देह के आलिंगन मेरा प्रेम तुम्हें मिल जाएगा
मैं भटकी सी एक पगडंडी तुम मंज़िल का अंजाम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये

तुमसे ही मेरी पीड़ा है तुमसे ही मेरा दर्पन है
यह टूटती हुई सी वीणा अब तेरे लिए समर्पण है
मैंने सदियों के अँधेरों को तेरी यादों से काटा है
सुख मैंने सारा लुटा दिया बस दर्द तुम्हारा बाँटा है
जब विरह अग्नि मुझे झुलसाए तुम बन जाना घनश्याम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये

जब प्राण पखेरू उड़ जाएँ मैं पवन झोंका बन जाऊँगी
तेरी बंद गली के मुहाने पर मैं धूल कणों सी छाऊँगी
क्या दुनिया के ये बंधन हैं क्या जन्म मरण का मेला है
जिसने भी प्रेम को पहचाना वो भीड़ में भी अकेला है
जब साँस की डोरी टूट पड़े तुम बन जाना विश्राम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये

मैं मैं न रहूँ तुम तुम न रहो कुछ ऐसा संगम हो जाए
यह वक़्त का जो भी पहिया है वो अपनी जगह ठहर जाए
हर एक विसर्जन की पीड़ा एक नया सृजन बन जाएगी
मेरी ये धड़कन युग युग तक बस तेरी कहानी गाएगी
जब रंज मिटेंगे जीवन के तब गूँजेगा यह नाम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये
-भानु शर्मा रंज
 
2 महीने पहले
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