मैं ओस बूँद सी ढलक गई तुम भोर किरण का चुंबन हो
मैं अर्थ हीन सी एक व्यथा तुम प्राणों का शुभ स्पंदन हो
यह देह वस्त्र तो नश्वर है मैं रूह का नेह निभाऊँगी
तुम कोरे कागज़ से आना मैं गीत नया बन छाऊँगी
इस शोर भरी सी दुनिया में तुम मेरा एक मुकाम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये
मैंने आँसू के रेशम से बस तेरी मूरत गूँथी है
ये रस्म रिवाज़ों की दुनिया मेरे लिए तो झूठी है
जब रूप रंग के मेलों से यह पागल मन उब जाएगा
तब बिना देह के आलिंगन मेरा प्रेम तुम्हें मिल जाएगा
मैं भटकी सी एक पगडंडी तुम मंज़िल का अंजाम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये
तुमसे ही मेरी पीड़ा है तुमसे ही मेरा दर्पन है
यह टूटती हुई सी वीणा अब तेरे लिए समर्पण है
मैंने सदियों के अँधेरों को तेरी यादों से काटा है
सुख मैंने सारा लुटा दिया बस दर्द तुम्हारा बाँटा है
जब विरह अग्नि मुझे झुलसाए तुम बन जाना घनश्याम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये
जब प्राण पखेरू उड़ जाएँ मैं पवन झोंका बन जाऊँगी
तेरी बंद गली के मुहाने पर मैं धूल कणों सी छाऊँगी
क्या दुनिया के ये बंधन हैं क्या जन्म मरण का मेला है
जिसने भी प्रेम को पहचाना वो भीड़ में भी अकेला है
जब साँस की डोरी टूट पड़े तुम बन जाना विश्राम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये
मैं मैं न रहूँ तुम तुम न रहो कुछ ऐसा संगम हो जाए
यह वक़्त का जो भी पहिया है वो अपनी जगह ठहर जाए
हर एक विसर्जन की पीड़ा एक नया सृजन बन जाएगी
मेरी ये धड़कन युग युग तक बस तेरी कहानी गाएगी
जब रंज मिटेंगे जीवन के तब गूँजेगा यह नाम प्रिये
मैं सदियों की भटकी कश्ती तुम मेरा अंतिम धाम प्रिये
-भानु शर्मा रंज