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जिस दिन मिल जाएँगे सबको

कौशलेंद्र

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            निसर्ग में देखी है किसी ने
        
                                                    
                            
कोई व्यवस्था
किसी आरक्षण की!

नहीं उगता धान
किसी मरुस्थल में
वह चिल्लाया-
हम पाँच करोड़ साल से प्यासे हैं
हमें देना ही होगा
शस्य श्यामला का आरक्षण।
बबूल भी बोले-
इतने सुंदर सुरभित पुष्प
तरुणी को ही क्यों
हमें क्यों नहीं?
काँटों भरी तन्वंगी
छुईमुई क्यों रहती पीछे
वह भी भुनभुनाई-
हमारे साथ भेदभाव होता है
हमें तो कोई छूता भी नहीं
हम दलित हैं
हमें सुकोमलता और सौंदर्य का
आरक्षण दो कमल सा।
मादा तिलचट्टी क्यों रहती पीछे
उसने माँग की-
हमें तो शिव के नंदी से ब्याह करना है।
दादर रेलवे स्टेशन पर घूमते
मोटे धूँस ने भाषण दिया-
जब तक नहीं होगा
हमारा पाणिग्रहण
स्वर्ग की कामधेनु से
समानता नहीं आ सकती ब्रह्माण्ड में।
सारी सुविधाएँ स्वर्ग में क्यों
नर्क में भी क्यों नहीं!
उधर दहाड़ा
अंतरिक्ष में विचरता
धूमकेतु आवारा-
हमें भी चाहिए आरक्षण
जैवविविधता का
सारी विविधता पर
धरती का ही आरक्षण क्यों?
पूरे ब्रह्माण्ड में
होड़ लगी थी
कुछ न कुछ माँगने की
कृष्णविवर ने भी माँग की
जिसकी जितनी शक्ति भारी
उसकी उतनी हिस्सेदारी
हमारा गुरुत्वाकर्षण सर्वाधिक है
हमें भी मिलना चाहिए
सूर्य सा सम्मान
और सृष्टि का अधिकार।

ब्रह्मा जी बोले-
जिस दिन मिल जाएँगे सबको
सारे अनधिकृत अधिकार
ब्रह्माण्ड बन जायेगा
लोकतांत्रिक भारत के
सरकारी प्रकल्पों सा
और तब
रौद्र नृत्य करना होगा
नटराज को,
देखना चाहोगे !
एक महीने पहले
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