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न खींच दामन को तू यूँ, न कर कोई ज़बरदस्ती

Kapil Dev Julka

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब तक मुक़द्दर मेहरबाँ है, ये कारवाँ चलता रहेगा,
        
                                                    
                            
चिराग़-ए-वस्ल रौशन है, दिल का जहाँ जलता रहेगा।

मिले हैं राह में हम-तुम, ये बस लकीरों का तमाशा है,
हवा का रुख़ बदलते ही, ये हर मंज़र बदलता रहेगा।

ये आना और ये जाना तो महज़ एक रस्म-ए-दुनिया है,
जो आज अपना सा लगता है, कल अजनबी सा लगता रहेगा।

न खींच दामन को तू यूँ, न कर कोई ज़बरदस्ती,
जो जाना चाहता है, वो मुसाफ़िर तो निकलता रहेगा।

गिरह रिश्तों की जो ढीली पड़े, तो मुस्कुरा के छोड़ दे,
जो धागा टूट जाता है, वो हाथों को छिलता रहेगा।

अता है ये भी उस रब्ब की, जो मिला है इस सफ़र में,
मगर हर शै से यूँ बेइंतहा, दिल का लगाना अच्छा नहीं होता।

मोहब्बत भी एक दरिया है, बहने दे इसे अपनी रवानगी से,
किनारे की चाहत में, ये दिल लहरों से कुचलता रहेगा।

मख़मली इस दर्द को भी, बिंदास होकर गले से लगा,
जुदा होकर भी ऐ 'कपिल', दुआओं का सिलसिला चलता रहेगा।
-कपिल देव जुल्का
 
2 दिन पहले
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