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गुलिस्ताँ-ए-इश्क़: कलाम-ए-कमरुन

Kamrunisa Nadaf

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रब की राहों में ही 'कमरुन' दिल को सुकूँ आता है,
        
                                                    
                            
हमसफ़र वो हो तो सफ़र इबादत बन जाता है।

आँख गर देख सके तो हर शय में नूर उसका है,
वो जिसे ढूँढता है जहाँ, वो शह-रग में नज़र आता है।

सौंप दे अपनी कश्ती को तू उस मौला के हवाले,
तूफ़ान भी उसकी रज़ा से फिर तो साहिल बन जाता है।

साफ़ कर ले तू आईना-ए-क़ल्ब को अपने पहले,
नूर-ए-इलाही फिर ख़ुद-ब-ख़ुद उसमें समा जाता है।

इश्क़-ए-हक़ीक़ी में बहा एक आँसू भी ऐ 'कमरुन',
ग़म के तपते हुए सहरा को भी गुलिस्ताँ बनाता है।

 
11 घंटे पहले
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