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दिल मष्तिष्क के थैले में सब भरकर..

kamlesh ranjan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिल मष्तिष्क के थैले में
        
                                                    
                            
सब भरकर..!

खाली बैठी पन्नों पर
क्या भरना है
सोच रही हूँ
चौकस इधर उधर के
भावों को मैं खोज रही हूँ
देखो इन भावों को भी
कौन सी
मस्ती आयी है
कभी उमड़ते कभी फिसलते
जाने क्या
बला ये छाइ है
अच्छा रचने को
इस बला मे
मै कुछ खोज रही हूँ
दिल मष्तिष्क के थैले में
सब भरकर कुछ तो मैं घोट रही हूँ

संताप हर्ष दुख उल्लास
ये क्या कि सबका
जमघट लगाए तौल रही हूँ
हर मुमकिन सीमा में घुसकर
कुछ अक्ल के धागे
खोल रही हूँ
घिसती घिसाती
ये कलम ही
भावों की मेरी परछाई है
हाँ तभी तो पन्नों पर
ये स्वप्न उड़ेलने को मस्ताई है
आगे बढ़ते मुड़ते उड़ते
कुछ अपने में ही
डोल रही हूँ
अपनी रचना कर्म रचने के
पोल आज मैं खोल रहीं हूँ

आगे बढ़ते मुड़ते उड़ते
कुछ अपने में ही
डोल रही हूँ
अपनी रचना कर्म रचने के
पोल आज मैं खोल रहीं हूँ
-कमलेश रंजन
5 दिन पहले
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