राहत की बात यह रही,
आज बारिश नहीं हुई,
जिनके सिर पर छत नहीं,
उनकी आँखें नम नहीं हुईं।
कच्ची दीवारों को भी
आज थोड़ा इत्मीनान था
टूटी छप्पर के नीचे
कोई चैन से सोया था।
मगर खेतों की पगडंडी पर
एक उदासी पसरी रही,
बादल आए, बिना बरसे गए,
धरती की प्यास ठहरी रही।
किसी के लिए बारिश आफ़त है,
किसी के लिए जीवन की आस,
एक ही मौसम, दो मजबूरियाँ,
एक तरफ़ राहत, दूसरी तरफ़ प्यास।
—कमल किशोर झा