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आख़िरी साँस तक

kamal jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब डूब रही थी कश्ती,
        
                                                    
                            
तुम भी उसी पर सवार थे।
चाहते तो किनारे की ओर
एक छलाँग लगा सकते थे।
भले तैरना न आता था,
शायद किस्मत तुम्हें बचा लेती।
कोई लहर हाथ थाम लेती,
कोई साँस किनारे पहुँचा देती।
पर तुम रुके—
आख़िरी साँस तक रुके।
क्योंकि तुम्हारे लिए
ज़िंदगी से बड़ा साथ था।
लोग पूछेंगे—
“जब मौका था, कूद क्यों नहीं गए?”
कौन समझाए उन्हें,
चाहता तो वह खुद को बचा लेता,
लेकिन अपने शब्दों को खो देता।
साँसे तो शायद बच जातीं,
पर खुद से नज़रें कैसे मिलाता।

वादे सिर्फ़ किए नहीं जाते हैं;
वक्त आने पर निभाए भी जाते हैं।
— कमल किशोर झा 
2 महीने पहले
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