विज्ञापन

ये बात मुझकों पता नहीं थी

Johnny Ahmed

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये बात मुझकों पता नहीं थी ख़त-ए-मुक़द्दर में वो नहीं थी
        
                                                    
                            
बदन तो उसका था पास मेरे मगर हाँ पैकर में वो नहीं थी

मैं जब भी आँखों को बंद करता हर एक जानिब वही थी दिखती
मगर इन आँखों को जब भी खोला किसी भी मंज़र में वो नहीं थी

कमान-ए-अबरू निगाह-ए-खंज़र तमाम फ़ित्ने थे उसके अंदर
अकेली फ़ौजी रही हमेशा किसी के लश्कर में वो नहीं थी

नसीब में थी बहुत सी दौलत बड़ा सा बंगला अज़ीम शोहरत
हर एक शय थी मुझे मयस्सर मगर मयस्सर में वो नहीं थी
-जॉनी अहमद क़ैस
3 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

PUSHPA PANDEY

147 कविताएं

View Profile

Anil Kumar

4253 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10845 कविताएं

View Profile

Anil Sinha

59 कविताएं

View Profile

Chandra Makanday

204 कविताएं

View Profile