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काश कोई गुमनाम सा

Jiya Maddheshiya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काश कोई गुमनाम सा मुझसे भी आकर मिले
        
                                                    
                            
काश किसी की यादों से मन मे एक फूल खिले जब कदम बढ़े, संग चलने को तो में क्यूँ घबरा जाती
हूँ ? जब होंठ खुले कुछ कहने को तो मैं चुप सी हो जाती हूं
क्या सुननी वाले लब्ज़ो को मेरी खामोशी सुन पाएंगे?
क्या संग में चलने वाले मेरे मन को भी अपनाएंगे?




 
2 सप्ताह पहले
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Prasoon Saxena

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