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हे दाता! हे अन्तर्यामी! तुमसे क्या छिपेगा?

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरे परमात्मा, तुम कण-कण में समाए हो,
        
                                                    
                            
सूक्ष्म से सूक्ष्म अणु में भी तुम ही समाए हो।
भीतर-बाहर, ऊपर-नीचे, कोई ठौर नहीं खाली,
तुम दृष्टा भी तुम ही हो, तुम ही दृष्टि की लाली।

वायु की गति में साँस तुम्हारी चलती जाती है,
जल की तरलता में करुणा तुम्हारी ढलती जाती है।
आकाश के विस्तार में धैर्य तुम्हारा झलकता,
पृथ्वी के आधार में प्रेम तुम्हारा पलता।

वन में ओषधि बनकर तुम रोग हरते हो,
अग्नि के तेज में तुम शक्ति भरते हो।
अन्न की शक्ति में तुम देह को पालते हो,
जीवों की सेवा में तुम जग को संभालते हो।

माँ के वात्सल्य में आँचल तुम्हारा लहराता,
पिता के दायित्व में कंधा तुम्हारा बन जाता।
गुरु के ज्ञान में दीप तुम्हारा जगमगाता,
सखा की हंसी में संबल तुम्हारा मुस्काता।

हृदय-गुहा में तटस्थ, तुम साक्षी बन बैठे हो,
बिना कहे सब सुनते, बिना देखे सब देखते हो।
हमारे कर्म, विचार, भाव और एहसास,
सबका लेखा रखते, बनते प्रारब्ध और आभास।

हे दाता! हे अन्तर्यामी! तुमसे क्या छिपेगा?
छाया भी सूरज से अपना भेद कहाँ रखेगा?

दे दो ऐसी प्रज्ञा जो सत्य-असत्य पहचाने,
दे दो ऐसी मेधा जो कर्तव्य को पहचाने।
दे दो धारणा अडिग, जो भटकन में न डोले,
दे दो धृति का बल, जो आँधी में भी न टोले।

दे दो तेज निर्मल, जो लोभ में न जले,
दे दो बल पवित्र, जो सेवा में ही पले।

कि हम सबके साथ चलें, सबके लिए जिएँ,
हर समय, हर घड़ी, धर्म की राह लिएँ।
जीवन पर्यंत कर्म शुभ और पवित्र करें,
निंदा-ईर्ष्या त्याग, करुणा का दीप धरें।

न मांग हमारी यश की, न मांग हमारी जय की,
बस एक मांग है प्रभु, योग्य बनें कृपा की।
जब कर्म तुम्हें भाएँ, तब आशीष बरस जाए,
और एक दिन ऐसा आए, हम तुममें समा जाएँ।

क्योंकि तुममें ही सृष्टि, तुममें ही प्रलय है,
तुममें ही आरंभ, तुममें ही अंत है।
जिसने तुम्हें पा लिया, उसने सब कुछ पा लिया,
और जो तुममें खो गया, वही अमर हो गया।
--- जगदीश प्रसाद शर्मा
2 महीने पहले
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