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मन से मंदिर तक

Jagdish Prasad

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                            "मन से मंदिर तक, शिव तक"
        
                                                    
                            

शिव दूर नहीं, शिव भीतर है,
कल्याण, शांति, सत्य की तस्वीर है।
मंदिर का शिवलिंग संकेत मात्र,
असली ज्योति जले तो भीतर का पात्र।

मन ही बंधन, मन ही मुक्ति का द्वार,
पहले शुद्ध करो आचार-विचार।
सत्य, दया, संयम का दीप जलाओ,
क्रोध-अहंकार को मौन सिखाओ।

आसन साधो, श्वास को साधो,
ॐ नमः शिवाय का जाप मन में साधो।
कैलास के शांत शिव को ध्याओ,
निर्भय, त्यागी गुण खुद में लाओ।

रूप से मंत्र, मंत्र से मौन,
मौन में ठहरे तो मिले शिव कौन?
"मैंने किया" का भाव मिटा दो,
कर्म को ईश्वर को समर्पित कर दो।

ध्यान का प्रमाण चमत्कार नहीं,
क्रोध घटे, करुणा बढ़े यही।
विपदा में भी मन डोले ना,
भीतर शांति का झरना बहे ना।

यात्रा मंदिर से मन तक जाती,
मूर्ति से तत्त्व तक पहचान बनाती।
जब मन पवित्र, अहंकार-मुक्त हो,
कर्तव्य-पथ पर सत्य से युक्त हो,
समझो उसी पल हुआ शिव-साक्षात्कार,
भीतर विराजे भोले भंडार।

 
2 महीने पहले
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