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हे परमात्मा, मार्ग दिखाओ

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            "हे परमात्मा, मार्ग दिखाओ"
        
                                                    
                            

हे परमात्मा! ये अनमोल जीवन, भंवरों में फँसकर घबराता है।
विषम परिस्थिति की गहरी धार, हर पल मन को डगमगाता है।

हे सर्वशक्तिमान! करबद्ध विनती, सद्बुद्धि का दीपक जला दो।
सही-गलत का भेद बता दो, धर्म-अधर्म की राह दिखा दो।

विवेक दो ऐसा तीक्ष्ण और तेज़, जो अंधियारे में भी राह खोजे।
जैसे नवभोर रात को चीर, उजाले का मार्ग प्रशस्त करे।

धृति का धैर्य भी वरदान दो, आंधी आए तो भी अडिग रहें।
डर के आगे घुटने न टेकें, कर्तव्य पथ पर डटकर चलें।

क्रोध की अग्नि बहुत भड़कती, शांति के जल से उसे बुझा दो।
क्षमा का सागर हृदय में भर दो, छोटी-छोटी बातों को भुला दो।

लोभ-मोह की कालिख मिटा दो, निर्मल मन का दर्पण बना दो।
सेवा-सुमन से जीवन महके, सबमें तेरा ही रूप दिखा दो।

मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो, अभाव से पूर्णता में ढाल दो।
भय के बंधन काटकर प्रभु, निर्भयता का कवच पहना दो।

जब तेरा हाथ सिर पर होगा, कोई तूफां हमें डरा न पाएगा।
'मैं' मिटेगा, 'तू' ही शेष रहेगा, यही जीवन तब सार्थक हो जाएगा।

--- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
स्वरचित मौलिक रचना
2 महीने पहले
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