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एक बूंद का सफर

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सागर से उठी थी बूंद, सूरज की आंच में,
        
                                                    
                            
भाप बन उड़ चली वो, नीले आकाश में।

हवा की शीतलता मिली, बादल में बदली,
सफेद-काले रूप लिए, धरती को निहार चली।

जब बोझिल हो गए बादल, बरसी धरती पर,
कहीं प्यास बुझाई पौधे की, कहीं गिरी नदी पर।

पहाड़ों से उतर आई, बनकर कलकल धारा,
गांव-खेत सींचे इसने, दिया सबको सहारा।

इंसां-पशु की प्यास बुझाई, जीवन को पाला,
फिर नदी के संग-संग, सागर को जा मिला।

वही चक्र फिर चला, अनवरत चलता जाए,
एक बूंद का सफर ही, सृष्टि को चलाता जाए।

ना शुरुआत है ना अंत, ये जल का है खेल,
जिस बूंद से उपजी सृष्टि, उसी में होवे मेल।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
3 महीने पहले
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