विज्ञापन

धरती की पुकार

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            "धरती की पुकार"
        
                                                    
                            

जनसंख्या बढ़ती जाए, संसाधन घटते जाएं,
लूट मची है धरती की, सबल उसे लूटे जाएं।

हक अपना सब जताते, ताकतवर बढ़े जाए,
गरीब धरती माँ की गोद खाली होते जाए।

कचरे के ढेर लगे हैं, नदियाँ मैली हो गईं,
सांसों में जहर घुला है, हवाएं भी दूषित हुईं।

मिट्टी में जहर उतरा, खेतों की उर्वरा घटी,
ध्वनि का शोर बढ़ा ऐसा, कानों की शांति मिटी।

पॉलिथीन का जाल ऐसा, सदियों तक न गल पाए,
पांच सौ साल बाद भी वो मिट्टी में न समाए।

धरती चीख-चीख करे पुकार, सुनो ओ मानव जात,
अगर बचाना है जीवन, तो अब संभलो इस बात।

मृदा, जल, वायु, ध्वनि और जनसंख्या पर रोक लगाओ,
तभी धरती बचेगी, तभी तुम भी अपना जीवन बचा पाओ।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile