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धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस भौतिक युग में भी एक ज्योति जगी थी,
        
                                                    
                            
शास्त्र स्वयं जैसे शरीर धर के चली थी।
त्याग, धर्म, विद्या की प्रतिमूर्ति कहलाए,
श्री करपात्री जी महाराज जग में पूजे जाएँ।

एक हाथ ही पात्र बना भोजन के लिए,
जितना मिल गया उसी में जीवन जिए।
इसी व्रत से नाम उनका जग में छाया,
स्वामी हरिहरानंद से "करपात्री" कहलाया।

शंकराचार्य का गौरव पद ठुकरा दिया,
भिक्षा में ही सारा जीवन बिता दिया।
दो-दो शंकराचार्य जिनके शिष्य बने,
पर पद की लालसा मन में कभी न ठनी।

ज्ञान का सागर, शास्त्रों का भंडार थे,
मीमांसा, वेदांत, दर्शन सब आधार थे।
रामचरित मानस को युगश्रेष्ठ मानते थे,
चित्रकूट की तपोभूमि में चातुर्मास करते थे।

गौमाता के हित सत्ता से टकराए,
इंदिरा से लड़े, धर्म की मशाल जलाए।
भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े प्रचारक,
हिन्दू हृदय के सच्चे भारत रत्नाकार।

दुर्भाग्य देखो इस देश की रीत,
कारसेवकों पर गोली चलाने को मिले भीत।
धर्म के लिए जीने वाले को उपेक्षा मिली,
और पद्म विभूषण कहीं और को छली।

अगर हम करपात्री को भूलते जाएँगे,
तो किस मुँह से खुद को हिन्दू कहलाएँगे?
बीसवीं सदी के धर्मसम्राट की गाथा,
हर घर-घर में पहुँचे यही मेरी प्रार्थना।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
3 महीने पहले
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