विज्ञापन

अहंकार

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अहंकार का छल यही, सबसे बड़ी वंचना है,
        
                                                    
                            
दोष सदा पर-पक्ष में, यही उसकी रचना है।

आत्म-मोह का आवरण, आँखों पर पड़ जाता है,
अंतर्दृष्टि ढक लेता, सत्य न दिख पाता है।

जब मन कुहासे में घिरा, भ्रम में भटक जाता है,
आत्म-समीक्षा का दीया, खुद ही बुझ जाता है।

अपने दोषों से विरत, जग को दोषी कहता है,
बाहर खोजे खोट सदा, खुद से दूर ही रहता है।

यह भ्रांति नव-सृजित जो, पथ से तुम्हें हटाती है,
आत्म-शुद्धि, ब्रह्म-बोध से, कोसों दूर ले जाती है।

जब तक इस माया-जाल को, तुम काट नहीं पाओगे,
समत्व और प्रौढ़ता को, कभी पा नहीं पाओगे।

छोड़ो यह अभिमान तो, भीतर प्रकाश होगा,
आत्म-दर्शन के पथ पर, फिर सच्चा विकास होगा।

 
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all