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भूत इंसान से बोला

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भूत इंसान से बोला—
        
                                                    
                            

मैं कैसे दरिंदा हूँ?
तू ही डराता है रात-दिन,
अपनों को, आजकल,
फिर मैं क्यों ज़िंदा हूँ?

अब कोई डरता नहीं मुझसे,
ऐ इंसान!
तेरे कारनामों से मैं शर्मिंदा हूँ।

डराने का बाज़ार
तूने अख़बार कर दिया,
इल्ज़ाम ख़ुद पर लगा बैठा था—
कि मैं ही दरिंदा हूँ!

मैंने तो अँधेरे को बदनाम किया था,
तूने उजाले में भी ख़ौफ़ बसा दिया।
मैं रात में डराता था कभी,
तूने दिन में भी मुझे डरा दिया!

मैं सन्नाटे में रहता हूँ,
तू शोर में दहशत बोता है।
मैं तो बस चेहरा बदलता हूँ,
तू इंसान होकर इंसान को डराता है।

मैंने कभी किसी का घर नहीं जलाया,
किसी की नींद नहीं छीनी,
किसी के सपनों का सौदा नहीं किया—
फिर भी बदनाम मैं ही हूँ!

अब आईना देखता हूँ तो डर जाता हूँ,
सोचता हूँ—
भूत मैं हूँ...
या तू?

मैं रात का साया हूँ,
छोड़ आया काया हूँ,
अँधेरा हूँ।
मगर—
मैंने ही बहुत बदनाम किया है अँधेरे को।

मैं सोच रहा हूँ—
भटक रही मेरी ये आत्मा,
जब मरेगी,
मुझे स्वर्ग मिलेगा या नर्क?
या फिर यही तेरे
कैद में रहूँगा?

मगर अब ख़ुद से यही पूछता हूँ—

अगर डर अब तुझसे लगता है,
तो बता, ऐ इंसान...
क्या मैं ज़िंदा हूँ?
.... जगदीश चंद्र कापड़ी
2 महीने पहले
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