यदि सारे ही सुदामा मान तुम्हें मित्र लें तो, मित्रता निभाने में परंपरा गँवाओगे।
आपकी परंपरा में एम वाई ही रहे हैं, इनमें पंडितों को लाके कहाँ बिठाओगे।
ये आए तो वो जाएँगे सिर धुनते रहोगे, व्यर्थ में स्वयम की हँसी ही करवाओगे।
इससे तो अच्छा है कि आप ये विचार छोड़ो, आप से न होगा आप मुँह की ही खाओगे।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'