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चाह रही मन माहिं कबौ

Indra Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चाह रही मन माहिं कबौ वह पूरि भई न जिया हरषा।
        
                                                    
                            
घोर घिरे नभ मंडल में घन बूँद नहीं कबहूँ बरसा।
नैनन बीच बसी निकसी नहिं पावन को जियरा तरसा।
आवति है सुध जौ वहिकी अरराय गिरै मुझ पै फरसा।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
2 महीने पहले
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