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कब बोलू मन की बात

Gaurav Saini

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पतझड़ में सारे रंग बिखरा दिए
        
                                                    
                            
फिर बसंत नें उन्ही शाखो पर फूल खिला दिए
वक़्त की धूप नें चेहरे बदल दिए
ख़ामोशी की छाँब नें महल कर लिए
नदी के आईने में ज़ब चुपके से चाँद उतरा
लेहरो न तो जैसे चमकिले चादर ओढ़ लिए
रेगिस्तान की धूप मे कोई बादल ठेर गया
जिसे प्रेम था बो तपती धूप में भी बरस गया
गुलमोहर की साख से लाल फूल झड़ते रहे
दोनों हमराही साथ थे लेकिन फिर भी मौसम बदलते रहे
कुदरत नें हर मौसम में मिलने का ढ़ँग लिखा
मगर " वक़्त नहीं " कह कर सब जाने दिया।
5 घंटे पहले
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