विज्ञापन

बंद कमरों में कभी बहार नहीं होती।

Ektarajesh Joshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ दर्द शब्दों से बयां नहीं होते ,
        
                                                    
                            
सिसकियों से निकली हुई आहटें
दूर तक नहीं जाती,
घुट घुट कर जी लेते हैं मरहूम अपनी मिल्कियतों में,
बंद कमरों में कभी बहार नहीं होती।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

13403 कविताएं

View Profile

Dr fouzia

6944 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

11075 कविताएं

View Profile