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बर्बादियों का शोर है, आँखों में ख़ूँ नहीं,,

Ejaz Ahamad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बर्बादियों का शोर है, आँखों में ख़ूँ नहीं,
        
                                                    
                            
यूँ देखते हैं लोग कि जैसे मैं हूँ नहीं।

इस हाल-ए-मुफ़्लिसी में ये बेगानगी तेरी,
कहनी बहुत सी बात, मगर कुछ कहूँ नहीं।

जिसको मिली बुलंदी, वही हो गया शनास;
बिकता तुम्हारे शहर में आईना क्यूँ नहीं?

राहों के दरमियान में पत्थर हैं ख़ार भी,
दरिया हूँ मैं बताओ कहाँ तक बहूँ नहीं।

जिसमें तमाम दर्द के होते हैं मशवरे,
बेजा रसाले होंगे उन्हें मैं पढूँ नहीं।

गुलशन लिखूँ बहार लिखूँ हुस्न दिल फरेब,
कब तक तमाशबीन तमाशा लिखूँ नहीं।
3 दिन पहले
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