आवत ही पिय की सुधि मो, अँसुवान सों भींजि गयो अँचरा।
बासर-नैन बिलोकत बाट, कहौ अब कासन सों दुखरा॥
कान्ह बिना हिय सालत है अति, सूखि गयो रस को गगरा।
पीर महा तिय की लखि के, अँसुवा बरसै जिमि मेघ-धरा॥
- सन्तोष कुमार शुक्ला 'सार्थक'