विज्ञापन

गीला कबूतर

Dr.charumitra nr

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी खिड़की के
        
                                                    
                            
उस पार
एक छोटा-सा
बारिश का भीगा
गीला कबूतर बैठा,
ठंड में काँपता,
थरथराता,
अपने पंखों को
झटककर
उन्हें सुखाने की
कोशिश करता
उसी कश्मकश में
मासूम असहाय
निगाहों से
मेरी ओर देखता हुआ
वह तो आज़ाद था,
और मैं खिड़की के इस पार,
निरीह असहाय
मानो क़ैद
अपने ही
कमरे में…....
वहीं एक ओर
पंकज उधास गा रहा था
“सोचो तो ये भी एक
क़फ़स ही तो है, जिसे
तहज़ीब की ज़बान में
कमरा कहा गया….!!!”

 
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile