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आराध्य, आराधना की सृष्टि।

Dr. Srk

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आराध्य, आराधना की सृष्टि।
        
                                                    
                            

आराधना, किसी देवता के समकक्ष हो
किसी चोटी से आह्वान हो
स्वर का निरंतर अर्पण हो
आवश्यक नहीं।
कुम्हार अपनी चकली पर तन्मय
मिट्टी के गोला को अपने सधे हथेलियों से आकार देता
जैसे प्रकृति की रचना हो,
आराधना ही होगी।
हारमोनियम पर उंगलियों को दौड़ाता गायक
तान लेते आँखें बंद बंद होती स्वतः
मानो गायन की आकृति को देख रहा हो,
आराधना ही होगी।
मूर्तिकार अपनी काठ या पत्थर या मिट्टी पर
एकाग्रचित, नर्म उंगलियों से औजार की चोट कर
सूक्ष्म मन से, जैसे सांसों की आहुति दे रहा हो
आराधना ही होगी।
आराध्य, हृदय से प्रस्फुटित रचना है,
प्रेम, ममता, करूणा से परिपूर्ण
विभिन्न आकार लेकर प्रदर्शित होती
आराधना का कारण बनती।
2 सप्ताह पहले
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