सच की राह का मुसाफ़िर हूँ, कोई साथ नहीं,
हर कोई काम लेता है, पर दिल में प्यार नहीं।
मेरा सीधापन सबको चुभता है बड़ा,
ईमान पर सबका हक़ है गड़ा।
मुसीबत आए तो सब हट जाएँ,
ताली बजाने वाले ही दग़ा कर जाएँ।
ईमानदारों की क़ौम है जो हर पल फँसे,
बेईमान को न कोई बचाए, हम ही आगे खड़े।
हमारा न कोई आरक्षण, न चिह्न पहचान,
जीवन भर सूली पे टँगे, बस इतना-सा अभिमान।
बदनाम करते हैं इतना कि हम ही काम आएँ,
मजबूरी में हमीं से काम करवाए जाएँ।
कोई चाहे हमारा अंत कर कुर्सी सजा ले,
पर हमसे बस उतना काम ले जितना ईमान दिला दे।
अफ़सोस कमज़ोर हाथों पर जो सारा बोझ धरें,
गलत काम के डर से आधा करवाएँ, हम बच निकलें।
यह बच निकलना भी एक सज़ा है गहरी,
हर साँस टीस, हर सुबह बेनूर-सी लहरी।
हम सहज हैं, मूर्ख नहीं—यही बात सच्ची,
गलत काम न करवा सके, यही जीत कच्ची।