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द्वंद्व से मुक्ति

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मौत माँगी तो भी इस दिल को सुकूँ आया नहीं,
        
                                                    
                            
छोड़ कर अपनों को जाने का मन भी तो बनाया नहीं।
कैसे जीऊँ इस तरह, यह समझ के पार है,
मौत में भी सुकूँ क्यों नहीं, यह कैसा अंधकार है?

जब यह रूह देह को छोड़ती है, तो क्यों तड़पती है?
अगर इस घर में रहना नहीं, तो इसमें क्यों बसती है?
जिस मिट्टी के घरौंदे को एक दिन छोड़ ही जाना है,
उसी के मोह में आखिर, क्यों इस दिल को तड़पाना है?

सुन ऐ मुसाफ़िर, रूह का कोई अपना घर नहीं होता,
यह देह तो बस एक सराय है, यहाँ ठहरना स्थायी नहीं होता।
तड़प मौत की नहीं, तड़प तो उस अधूरेपन की है,
जो अपनों की ममता और छूटते बंधनों की है।

मौत में सुकूँ तलाशना बंद कर, सुकूँ तो 'भीतर' का नाम है,
ना जीने में, ना मरने में, शांति तो बस स्वयं के विश्राम में है।
साँस जब तक चलती है, वही तेरा सच्चा धर्म है,
जिंदगी से भागना नहीं, हर हलचल को स्वीकारना ही कर्म है।

न जी-जी कर मर, न मरने की दुआ कर,
जो पल मिला है आज, बस उसमें खुद को रिहा कर।
ना देह तेरी, ना यह तड़प तेरी, तू तो अमर एक जोत है,
स्वीकार ले जब इस सच को, फिर न जीवन बोझ है, न भयभीत करती मौत है।

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एक महीने पहले
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