विज्ञापन

ज़िंदगी के ख़्वाब

Dr. Mohammad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी मेरे बचपन की यादों ने बोला,
        
                                                    
                            
कभी रह गया मैं ख़ुद ही अकेला।
ज़िंदगी के अपने हैं अजब ही झमेले,
कि मेले में होकर भी मैं हूँ अकेला।

बोझ बन गई ज़िंदगी में शराफ़त,
मैंने ज़माने में बहुत कुछ है झेला।
जिन्हें अपना समझकर लुटाता रहा दिल,
वही लोग निकले बड़े मतलबी अलबेला।

कभी अश्क़ बनकर छलकता रहा मैं,
कभी दर्द बनकर रहा दिल में मेला।
किसी ने न पूछा कि क्या हाल है मेरा,
मैं हँसता रहा और अंदर से टूटा अकेला।

वफ़ाओं की ख़ातिर बहुत कुछ गंवाया,
मगर हाथ आया न कोई सवेरा।
हर एक मोड़ पर मिली बेवफ़ाई,
हर एक ख़्वाब निकला अधूरा-अधूरा।

मैंने रिश्तों को दिल से निभाया,
मगर वक़्त ने हर रिश्ता तौला।
जिसे उम्र भर अपना समझता रहा मैं,
उसी ने मुझे भीड़ में तन्हा छोड़ा।

कभी ख़ामोशी ने मेरा साथ दिया है,
कभी आँसुओं ने मेरा राज़ खोला।
मैं ख़ुद से ही करता रहा गुफ़्तगू फिर,
जब दुनिया ने मुझसे मुँह अपना मोड़ा।

न शिकायत किसी से, न कोई गिला है,
बस दिल में दबा एक अरमान है भोला।
ज़िंदगी तूने जो दर्द दिया है,
उसी दर्द ने मुझको जीना भी सिखाया।

अब न मंज़िल की कोई तमन्ना रही है,
न शिकवा है राहों से, न कोई शिकवा।
जो मिला, उसे ख़ुदा की रज़ा मान लिया,
जो छूटा, उसे वक़्त के नाम कर डाला।

कभी मेरे बचपन की यादों ने बोला,
कभी रह गया मैं ख़ुद ही अकेला।
ज़िंदगी के मेले में सब अपने थे लेकिन,
मैं अपने ही साये में चलता रहा अकेला।
1 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

dinesh chauhan

3544 कविताएं

View Profile

Manoj Kumar

420 कविताएं

View Profile