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वतन के जख़्म ...

Dr Mahesh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हाथों में चमकाते आए ज़ुल्मों-सितम की कटारी
        
                                                    
                            

सोना लूटकर ले गया वो ज़ालिम लुटेरा ग़ज़नवी
ज़ख़्म वो छाती पर दे गया बेहद गहरे और भारी

सम्राट अशोक ने तुझको सींचकर एक अखंड देश बनाया
गद्दारों के दिल को कभी यह रास न आया

तक़दीर ने हरदम तुझपर ऐसे तीखे आघात किए
टुकड़ों में बंटा हुआ ही खंडित भारत हाथ आया

तेरी इस पावन माटी पर क्यों यह रुदन लिखा हैं ?
ऐ वतन ज़रा बता,क्यों तेरा दमन लिखा हैं ?

क्या तेरी ही थाली में ये ज़हर के निवाले लिखे हैं ?
ऐ वतन क्या तेरी तक़दीर में सिर्फ़ घोटाले लिखे हैं?

आए थे फिरंगी छल करने बनकर व्यापारी
करते रहे इस देश की पीठ पर वार वो बारी-बारी

सदियों तक ज़ंजीरों में जकड़ा तुझे बेदर्द ज़ालिमों ने
हर कठिन दौर में अपनों ने ही की तुझसे गद्दारी

तेरी छाती पर क्यों धरती का यह बांटना लिखा हैं ?
ऐ वतन बता ज़रा, क्यों तेरा बार-बार लुटना लिखा हैं ?

ग़ैरों की हर साज़िश से तू सीना तान लड़ जाता हैं
ज़ख़्मों को भी हंसकर तू अपनी छाती पर सह जाता हैं

जब अपने ही घर के भेदी बेईमान बन जाते हैं
कुर्सी की ख़ातिर वो विदेशों में ज़मीर बेच आते हैं

क्या अपनों ही के हाथों तेरा यह दमन लिखा हैं ?
ऐ वतन तेरी तक़दीर में क्या केवल ज़ख़्म लिखा हैं ?

लाल आँखें लिए चीन सीमा में घुस आता हैं
ताक़त के दंभ में अमेरिका भी आँख दिखाता हैं

पीटकर ढोल अमन का,पाकिस्तान छिपकर वार करे
नापाक मंसूबों से हरदम सीने पर प्रहार करे

कभी आतंक का साया,कभी नक्सल की ज्वाला हैं
अपनों के ही लहू से रंगा यह ज़हर का प्याला हैं

कभी पंजाब कभी कश्मीर,कभी मणिपुर सुलगता हैं
भीतर ही भीतर क्यों नफ़रत और अलगाव पनपता हैं

दीमक-सा चाट रही देश के भीतर की चिंगारियाँ
अपनों ही की भूलों से पनपीं ये गहरी बीमारियाँ

कब तक सहेगा तू भारत,यह ज़िल्लत और चालाकी?
क्या वीरों की भूमि पर बस सहना ही लिखा हैं बाक़ी?

उठ ऐ वतन..अब तुझे ही अपनी तक़दीर बदलनी होगी
विश्वासघात की हर ज़ंजीर अब भट्टी में पिघलनी होगी

पहचानना ही होगा अब आस्तीन के छिपे सांपों को
नव-सूर्य की स्वर्णिम राह तुझे अब चलनी होगी

क्या वीरों की इस माटी में कायर होना लिखा हैं ?
क्यों इतिहास के पन्नों पर बस तेरा रोना लिखा हैं ?

ऐ वतन उठ खड़ा हो,अब तो तेरी जीत का परचम लिखना बाकी हैं
सोए हुए शेर अब उठ जा, तेरा विश्व-विजेता बनना अभी बाकी हैं

हाँ वतन... अब सिर्फ और सिर्फ तेरी जीत का परचम लिखना बाकी हैं !!
 
एक महीने पहले
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