विज्ञापन

लोकतंत्र हूँ मैं ...

Dr Mahesh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लोकतंत्र हूँ मैं ...
        
                                                    
                            

खेतों से लेकर खलियानों तक
इमारतों से कच्चे मकानों तक

तपती धूप, ठंड और बरसात में
जीता हूँ मैं खुले आसमान में

दुनिया का विशाल लोकतंत्र हूँ मैं !

बेकारी और लाचारी में
भूखमरी और बीमारी में

सिसकता हूँ,चीखता,रोता हूँ
मैं हर रोज़ इसी गर्द में सोता हूँ

दुनिया का विशाल लोकतंत्र हूँ मैं !

जाति के नाम पर बँट जाता हूँ
धर्म के नाम पर लुट जाता हूँ

हक़ माँगूँ तो पिट जाता हूँ
सिर उठाऊँ तो कट जाता हूँ

दुनियाँ का विशाल लोकतंत्र हूँ मैं !

सड़कों की साफ़-सफाई में
फसलों की लहलहाई में

मजदूरों-किसानों के पसीने में
जवानों के जलते सीने में

दुनिया का विशाल लोकतंत्र हूँ मैं !

नारियों की लुटती अस्मत पर
जनता की फूटी किस्मत पर

किसानों की उस आत्महत्या पर
निर्दोषों की जघन्य हत्या पर

बेबस होकर आँसू बहाता हूँ
दुनिया का विशाल लोकतंत्र हूँ मैं !

शहीदों का खुलेआम अपमान पर
गद्दारों के सरकारी गुणगान पर

तख्त के हर झूठे फ़रमान पर
क्यों बहरा और मौन खड़ा हूँ?

दुनिया का विशाल लोकतंत्र हूँ मैं !

दुनियाँ हमें सबसे बड़ा लोकतंत्र कहती हैं
पर तंत्र का जहरीला दंश जनता सहती हैं

वोटों की चोरी का मुझ पर लगा कलंक हैं
लोक के संग यहाँ तंत्र का सीधा दमन हैं

कभी राजा, ज़मींदार, कभी मुगलों का दरबार था
अंग्रेज़ों की गुलामी थी, फिर आया स्वराज था

पहले हम इतिहास का एक महान किस्सा थे
आज लोकतंत्र में सिर्फ एक बेनाम भीड़ का हिस्सा हैं

गैरों का जुल्म सहा,अब अपनों के वार सहते हैं
कितने भी सितम करो साहब,चुपचाप सहते हैं

क्या गुलामी आज भी हमारी रगों में बहती हैं
जो पीड़ा को जनता,कर्मो का दंड मानकर सहती हैं

सीना तानकर,हर दर्द छुपाकर फिर भी कहूंगा मैं
हाँ, दुनियाँ का विशाल लोकतंत्र हूँ मैं !

 
2 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Şhahnawaz Pahat

39 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13403 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

11075 कविताएं

View Profile