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तुम्हारे पैर

Dr BKS Sanjay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम्हारे पैरों को स्पर्श करता हूँ,
        
                                                    
                            
नमन करता हूँ।
मैं तुम्हारे पैरों से प्रेम करता हूँ,
महज़ इसलिए कि मेरा वज़न
तुम्हारे पैरों ने सहा-
उस समय,
जब हमारे अपने पैर इस क़ाबिल नहीं थे
कि वे अपना ही वज़न सह सकें।

तुम्हारे पैर मुझे ले गये-
शौचालय, विद्यालय,पूजालय,
खेत और खलिहान तक,
जहाँ से पाया मैंने इतना ज्ञान।

यदि तुम्हारे पैरों ने सहारा न दिया होता,
यदि तुम्हारे पैरों का साथ न मिला होता,
तो आज यह व्यक्ति
बेचारा और बेसहारा होता।

आज मुझे गर्व है-
अपने पैरों पर नहीं,
तुम्हारे पैरों पर,
जिन्होंने मेरे पैरों में
उड़ान के पर लगा दिये।

कहाँ हैं तुम्हारे वे पैर?
उन्हें शत-शत नमन,
उन्हें शत-शत प्रणाम।
2 महीने पहले
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